क्या अतीक अहमद के वोट ने 2008 में यूपीए सरकार को गिरने से बचाया था?

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कई मीडिया आउटलेट्स ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि 2008 में अतीक अहमद ने कांग्रेस की नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के समर्थन में वोट करके उसे गिरने से बचाया था. ये दावा बेबुनियाद है. भारत-अमेरिका के बीच परमाणु समझौते को लेकर पार्टियों की असहमति के बाद तत्कालीन सरकार को फ़्लोर टेस्ट देना पड़ा था जिसमें अतीक ने यूपीए सरकार के विरोध में मत दिया था. जिस किताब को सन्दर्भ बता कर ये गलत रिपोर्टिंग हुई है, उसके लेखक राजेश सिंह ने एएफ़पी से कहा कि उनसे चूक हुई थी.

हाल ही में पूर्व सांसद और गैंस्टर अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ़ को सरेआम गोली मार दी गयी थी. ये हत्या पुलिस की मौजूदगी में हुई जब दोनों भाई प्रयागराज में चेकअप के लिए लाये जाने के दौरान मीडिया को इंटरव्यू को दे रहे थे.

दोनों मृतकों का अपराध जगत से गहरा नाता था और उनपर 100 से अधिक मामले दर्ज थे. इसपर एएफ़पी की रिपोर्ट यहां पढ़ सकते हैं.

इसके बाद ही प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया ने 16 अप्रैल को एक रिपोर्ट छापी जिसके मुताबिक अतीक अहमद ने 2008 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को अविश्वास प्रस्ताव में समर्थन दिया था. इसके बाद कई मीडिया संस्थानों ने ये ख़बर चलाई.

मनमोहन सिंह 2004 से 2014 तक कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में देश के प्रधानमंत्री रहे (आर्काइव लिंक). जुलाई 2008 में यूपीए गठबंधन से लेफ़्ट पार्टियों ने बगावत कर दी क्योंकि वो भारत-अमरीका परमाणु समझौते का विरोध कर रहे थे जिसके बाद ये फ़्लोर टेस्ट करवाना पड़ा (आर्काइव लिंक्स यहां और यहां).

पीटीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अतीक अहमद और पांच अन्य "अपराधी नेता यूपीए सरकार और भारत-अमरीका परमाणु समझौते को बचाने के लिए निर्णायक थे."

इस रिपोर्ट का स्रोत लेखक राजेश सिंह की किताब "बाहुबलिस ऑफ़ इंडियन पॉलिटिक्स: बुलेट टू बैलट" है. इसके मुताबिक अतीक अहमद ने "अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए अपना कीमती वोट दिया, इसमें कोई शक नहीं है कि मुसिबत में पड़े यूपीए के पक्ष में था."

इसके बाद पीटीआई को जैसे ही मालूम चला कि उन्होंने गलत सूचना प्रकाशित कर दी है, उन्होंने अगले दिन 17 अप्रैल को आर्टिकल वेबसाइट से हटा लिया (आर्काइव लिंक).

पीटीआई की रिपोर्ट का 24 अप्रैल, 2023 को लिया गया स्क्रीनशॉट

अतीक अहमद ने 1989 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जीता था. कुल पांच बार विधायक रहने के बाद अहमद ने 2004 में समाजवादी पार्टी से लोकसभा चुनाव जीता था (आर्काइव लिंक).

कांग्रेस को बचाए जाने वाले दावे पर कई मीडिया संस्थानों ने रिपोर्टिंग की. हिंदी में यहां, यहां और यहां; और अंग्रेज़ी में यहां, यहां, यहां और यहां ये ख़बर छपी.

ये दावा फ़ेसबुक पर भी यहां और यहां; और ट्विटर पर यहां और यहां शेयर हुआ.

संसद के दस्तावेज़

पत्रकार आरिश छाबरा ने एक ट्विटर थ्रेड में संसद के दस्तावेज़ का लिंक शेयर किया जिसके मुताबिक 2008 के फ़्लोर टेस्ट में अतीक अहमद ने यूपीए सरकार के ख़िलाफ़ वोट दिया था. (आर्काइव लिंक्स यहां और यहां)

उन्होंने लिखा, “क्या अतीक अहमद ने 2008 में मनमोहन सिंह की सरकार को गिरने से बचाया था. नहीं. बल्कि उन्होंने अपनी पार्टी एसपी के ख़िलाफ़ जाते हुए यूपीए के विरोध में वोट किया था.”

लोकसभा में 21 जुलाई, 2008 को हुए इस फ़्लोर टेस्ट के मिनट्स में लिखा है कि अतीक ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के ख़िलाफ़ वोट किया था.

नीचे लोकसभा के दस्तावेज़ का स्क्रीनशॉट है जिसमें पेज नं. 112 पर अतीक अहमद का नाम ‘Noes’ यानी ‘नहीं’ वाली सूची में है.

संसद के दस्तावेज़ का 24 अप्रैल, 2023 को लिया गया स्क्रीनशॉट

"बाहुबलिस ऑफ़ इंडियन पॉलिटिक्स: बुलेट टू बैलट" के लेखक राजेश सिंह ने एएफ़पी को बताया कि उन्होंने ये लिखने में गलती की है कि अतीक अहमद ने कांग्रेस के समर्थन में वोट देते हुए यूपीए सरकार को बचाया था.

उन्होंने कहा, “वो एक चूक थी, और मीडिया में ग़लत समय पर फैल गयी.”

“लेकिन वो एक ऑनेस्ट मिस्टेक थी. अगर आप बड़े सन्दर्भ में देखें तो सभी पार्टियां किसी न किसी तरह से वोट पाने के लिए इनकी (बाहुबली) मदद लेती है.”

हिंदुस्तान टाइम्स की इस रिपोर्ट के मुताबिक, “यूपीए सरकार ने 275 मतों के साथ ये अविश्वास प्रस्ताव जीता वहीं 256 सांसदों ने इसके ख़िलाफ़ वोट किया. (आर्काइव लिंक)”

रिपोर्ट्स के अनुसार इसके बाद अहमद और पांच अन्य लोगों को समाजवादी पार्टी से निष्काशित कर दिया गया था. इसपर इंडिया टुडे की 2008 की रिपोर्ट पढ़ सकते हैं (आर्काइव लिंक).

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