महाराष्ट्र में धार्मिक यात्रा में शामिल भीड़ का वीडियो "अरावली बचाव प्रदर्शन" बताकर शेयर किया गया

सुप्रीम कोर्ट के अरावली पहाड़ियों की परिभाषा बदलने के फ़ैसले के बाद लगभग पूरे उत्तर भारत में विरोध प्रदर्शन हुए. पर्यावरणविदों का कहना है कि इस फ़ैसले से अरावली श्रृंखला की कई पहाड़ियों पर खनन और निर्माण के रास्ते खुल जाएंगे. हालांकि सोशल मीडिया पर व्यापक विरोध प्रदर्शन के दावे से शेयर गया एक वीडियो दरअसल सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से कई महीने पहले का है. असल वीडियो में एक धार्मिक यात्रा में शामिल लोगों की भीड़ दिखाई दे रही है.

फ़ेसबुक पर 20 दिसंबर, 2025 को शेयर की गई पोस्ट का आंशिक कैप्शन है, "20 नवंबर 2025 को, सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने अरावली हिल्स और रेंज की परिभाषा के बारे में एक अहम फैसला सुनाया."

"इसका सीधा मतलब यह है कि अब अरावली के ज्यादातर इलाकों को खनन (माइनिंग) के लिए खोल दिया जाएगा."

भारी भीड़ दिखाते इस वीडियो के ऊपर लिखा है: "अरावली को बचाने लाखों लोग तैयार है."

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गलत दावे से शेयर की गई फ़ेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट जिस पर एएफ़पी द्वारा X साइन जोड़ा गया है

यह वीडियो फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, थ्रेड्स और X जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर नवंबर में सुप्रीम कोर्ट के उस  फ़ैसले के बाद वायरल हुआ जिसमें अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को सीमित कर दिया गया. 

अरावली दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली तक फैली हुई है. इस फ़ैसले के बाद से देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए (आर्काइव्ड लिंक).

नई परिभाषा के तहत 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले इलाकों को अरावली क्षेत्र से बाहर कर दिया गया है, जिन पर अब खनन प्रतिबंध लागू नहीं होंगे (आर्काइव्ड लिंक).

पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि इससे कई महत्वपूर्ण पहाड़ खनन और निर्माण के घेरे में आ जाएंगे, जबकि सरकार का कहना है कि ये कदम संरक्षण को मज़बूत बनाता है (आर्काइव्ड लिंक यहां और यहां).

29 दिसंबर, 2025 को अपने ही आदेश पर रोक लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नई परिभाषा के संभावित प्रभावों की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया (आर्काइव्ड लिंक).

हालांकि, सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो सुप्रीम कोर्ट के मूल फ़ैसले से पहले का है.

गलत दावे से शेयर किए गए वीडियो के की-फ़्रेम्स को गूगल पर रिवर्स इमेज सर्च करने पर वही फ़ुटेज 2 अगस्त को इंस्टाग्राम पर शेयर किए गए एक पोस्ट में मिला, जिसे महाराष्ट्र के एक न्यूज़ पोर्टल ने पोस्ट किया था (आर्काइव्ड लिंक).

उसी पोर्टल ने इस फ़ुटेज को 31 जुलाई को अपने यूट्यूब चैनल पर एक लंबे वीडियो के हिस्से के रूप में भी अपलोड किया था (आर्काइव्ड लिंक).

इंस्टाग्राम वीडियो का मराठी कैप्शन है, "गजानन महाराज की पालकी खामगांव शहर से शेगांव की ओर रवाना हुई."

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गलत दावे से शेयर की गई क्लिप (बाएं) और अगस्त 2025 में पोस्ट किए गए इंस्टाग्राम वीडियो के स्क्रीनशॉट की तुलना

श्री संत गजानन महाराज की पालकी यात्रा एक वार्षिक आध्यात्मिक आयोजन है जिसमें तीर्थयात्री दो महीने की अवधि में 1,275 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हैं (आर्काइव्ड लिंक).

एएफ़पी ने पहले भी इसी तरह के गलत दावे को फ़ैक्ट चेक किया है, जिनमें भीड़ के फ़ुटेज को कोर्ट के फ़ैसले के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन बताया गया था.

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