फ़ोन की लाइट जलाकर प्रदर्शन करते लोगों का ये वीडियो एआई-जेनरेटेड है
- प्रकाशित 29 जनवरी 2026, 06h32
- 4 मिनट
- द्वारा Lucía DIAZ, एफप स्पेन, एफप भारत
- अनुवाद और अनुकूलन Gwen Roley, AFP Canada, Devesh MISHRA
ईरान में सरकार द्वारा लगाए गए इंटरनेट ब्लैकआउट के बीच बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो जिसमें लोग अपने मोबाइल फ़ोन की रोशनी में सड़कों पर मार्च कर रहे हैं, ईरान के हालिया प्रदर्शनों का नहीं है. यह फ़ुटेज दरअसल आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस टूल्स की मदद से तैयार किया गया है, जिसकी पुष्टि इसके निर्माता ने एएफ़पी से की है.
X पर 11 जनवरी, 2026 को शेयर की गई पोस्ट का कैप्शन है, "ईरान के 18 बड़े शहरों का क़रीब 17 लाख सामान्य नागरिक सड़कों पर है."
वीडियो में दिखाई देता है कि बड़ी संख्या में लोग सड़क पर मार्च कर रहे हैं और उनके मोबाइल फ़ोन की फ़्लैशलाइट ऊपर की ओर जल रही है.
वीडियो फ़ेसबुक और X पर भी इसी तरह के दावे के साथ शेयर किए गए हैं, जिनमें इन्हें ईरान में हुए प्रदर्शनों का बताया गया. ये प्रदर्शन देश की आर्थिक बदहाली से नाराज़गी के चलते शुरू हुए थे और प्रशासन द्वारा इन पर सख्ती से कार्रवाई के चलते ये हिंसक हो गए (आर्काइव्ड लिंक).
देशभर में फैले ये प्रदर्शन 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ईरान पर शासन कर रही धार्मिक राज्यसत्ता के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गए हैं. कई लोग इस्लामिक शासन को खत्म करने की मांग भी कर रहे हैं (आर्काइव्ड लिंक).
ईरानी अधिकारियों ने प्रदर्शनों के लिए विदेशी दख़ल को ज़िम्मेदार ठहराते हुए इसके जवाब में अपने समर्थन में देशव्यापी रैलियां भी निकाली.
प्रदर्शन शुरू होने के बाद से एएफ़पी ने ईरान में हुए आंदोलनों से जुड़ी बताकर ऑनलाइन शेयर की कई भ्रामक पो्ट्स को फ़ैक्ट-चेक किया है. मोबाइल फ़ोन की रौशनी में प्रदर्शन का ये वीडियो भी इसी तरह गुमराह करने वाला है.
मैड्रिड की पॉलिटेक्निक यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर और नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग व डीप लर्निंग समूह के सदस्य जेवियर हुएर्तास-तातो ने 12 जनवरी को ईमेल के जरिए एएफ़पी को बताया कि वीडियो में कई ऐसी विज़ुअल खामियां हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि इसे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से बनाया गया है (आर्काइव्ड लिंक).
उन्होंने उदाहरण के तौर पर अचानक उभरती परछाइयों और हाथों, साथ ही खिड़कियों में रोशनी के कमज़ोर प्रतिबिंब की ओर इशारा किया.
एएफ़पी के सहयोग से बनाये गये टूल InVID-WeVerify का उपयोग कर वीडियो के एक स्क्रीनशॉट का विश्लेषण करने पर भी इस बात के सबूत मिले कि यह आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से तैयार किया गया था.
गलत दावे वाला वीडियो शेयर करने वाले कुछ पोस्ट में इंस्टाग्राम यूज़र @elnaz555 का वॉटरमार्क था. यह अकाउंट एलनाज मंसूरी का है, जो एक मल्टीडिसिप्लिनरी आर्टिस्ट हैं और रेगुलर AI टूल्स का इस्तेमाल करती हैं (आर्काइव्ड लिंक).
मंसूरी ने 13 जनवरी को AFP को डायरेक्ट मैसेज में बताया किया कि उन्होंने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करके यह वीडियो बनाया है. उन्होंने इंस्टाग्राम और X पर यह भी बताया कि फ़ुटेज AI से बनी थी, और कहा कि इसका मकसद ईरान के डिजिटल ब्लैकआउट के बाद की असलियत को "दिखाना" था (आर्काइव्ड लिंक यहां, यहां).
वीडियो के ऊपर लिखा है-- "All eyes on Iran" -- जो गाजा पट्टी में राफ़ा पर इज़रायली हमले के खिलाफ़ 2024 के एडवोकेसी कैंपेन में इस्तेमाल किये गये इसी तरह के डिजिटल कैंपेन की याद दिलाता है, जिसे AI से बनी तस्वीरों से भी दिखाया गया था.
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से बनी अन्य गलत सूचनाओं को एएफ़पी ने यहां फ़ैक्ट-चेक किया है.
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